“BRICS ब्लॉक अब इतना तेजी से बढ़ रहा है कि वह G7 की तुलना में आगे निकलता दिख रहा है।
“BRICS ब्लॉक अब इतना तेजी से बढ़ रहा है कि वह G7 की तुलना में आगे निकलता दिख रहा है।

“BRICS ब्लॉक अब इतना तेजी से बढ़ रहा है कि वह G7 की तुलना में आगे निकलता दिख रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की नवीनतम वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (World Economic Outlook, अक्टूबर 2025) रिपोर्ट के अनुसार, विस्तारित ब्रिक्स (BRICS+) समूह — जिसमें अब सऊदी अरब, मिस्र, यूएई, इथियोपिया, इंडोनेशिया और ईरान भी शामिल हैं — 2025 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि का प्रमुख इंजन बनने जा रहा है।

इन उभरती अर्थव्यवस्थाओं में, इथियोपिया 7.2% की अनुमानित दर के साथ सबसे तेज़ विकास करने वाला देश रहेगा, जबकि भारत 6.6% की दर से दूसरे स्थान पर बना रहेगा। चीन और यूएई दोनों 4.8% की दर से आगे बढ़ेंगे। वहीं, सऊदी अरब (4.0%) और मिस्र (4.3%) जैसी तेल-आधारित अर्थव्यवस्थाएँ भी मजबूत वृद्धि बनाए रखेंगी।

इसके विपरीत, ब्राज़ील (2.4%), रूस (0.6%), और ईरान (0.6%) जैसे देशों की वृद्धि दर अपेक्षाकृत धीमी रहने का अनुमान है। कुल मिलाकर, ब्रिक्स देशों की औसत जीडीपी वृद्धि दर 3.8% होगी — जो कि G7 देशों (1.0%) की तुलना में चार गुना अधिक है।

यह आँकड़ा बताता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र अब तेजी से उभरते देशों की ओर स्थानांतरित हो रहा है, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाएँ मुद्रास्फीति, जनसंख्या वृद्धावस्था और उत्पादकता में गिरावट जैसी चुनौतियों से जूझ रही हैं।


G7 देश क्यों पिछड़ रहे हैं?

IMF रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में G7 देशों की औसत वृद्धि दर सिर्फ 1.0% रहने की संभावना है।
इस समूह में संयुक्त राज्य अमेरिका (2.0%) सबसे आगे रहेगा, जबकि यूके (1.3%), कनाडा (1.2%) और जापान (1.1%) उसके बाद आएंगे।
यूरोप की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँफ्रांस (0.7%), इटली (0.5%), और जर्मनी (0.2%) — कमजोर प्रदर्शन करेंगी।

रिपोर्ट बताती है कि इन देशों की आर्थिक मंदी के पीछे कई कारण हैं:

  • कठोर मौद्रिक नीतियाँ: मुद्रास्फीति पर नियंत्रण पाने के लिए केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें ऊँची रखी हैं, जिससे निवेश और उपभोग दोनों पर दबाव पड़ा है।

  • कम घरेलू मांग: उपभोक्ता खर्च घटने से उत्पादन और रोजगार दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

  • भू-राजनीतिक तनाव: यूक्रेन युद्ध, व्यापार असंतुलन और सप्लाई चेन व्यवधानों ने यूरोप की अर्थव्यवस्था को और कमजोर किया है।

इस प्रकार, विकसित अर्थव्यवस्थाएँ स्थिरता बनाए रखने की कोशिश में हैं, लेकिन गति खो रही हैं


2025 में अनुमानित जीडीपी वृद्धि दर

ब्रिक्स देश (BRICS+)

देश अनुमानित जीडीपी वृद्धि दर (%)
इथियोपिया 7.2
भारत 6.6
इंडोनेशिया 4.9
चीन 4.8
यूएई 4.8
मिस्र 4.3
सऊदी अरब 4.0
ब्राज़ील 2.4
दक्षिण अफ्रीका 1.1
रूस 0.6
ईरान 0.6
औसत 3.8

G7 देश

देश अनुमानित जीडीपी वृद्धि दर (%)
अमेरिका 2.0
यूनाइटेड किंगडम 1.3
कनाडा 1.2
जापान 1.1
फ्रांस 0.7
इटली 0.5
जर्मनी 0.2
औसत 1.0

(स्रोत: IMF World Economic Outlook, अक्टूबर 2025)


वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव

ब्रिक्स (3.8%) और G7 (1.0%) की वृद्धि दर के बीच यह बड़ा अंतर अब सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत है।

ब्रिक्स देशों की तेजी के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं:

  1. घरेलू बाजारों का विस्तार: भारत, इंडोनेशिया और चीन जैसे देशों में मध्यम वर्ग की बढ़ती आबादी उपभोग और निवेश को नई दिशा दे रही है।

  2. डिजिटल और औद्योगिक नवाचार: डिजिटल पेमेंट, मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में तीव्र निवेश विकास को गति दे रहा है।

  3. संसाधन और जनसांख्यिकी लाभ: युवा आबादी, ऊर्जा संसाधन और श्रम उपलब्धता इन अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक बढ़त दे रहे हैं।

इसके विपरीत, विकसित देशों में वृद्ध जनसंख्या, ऊँची लागत, और कम उत्पादकता वृद्धि विकास के लिए बड़ी बाधा बनी हुई हैं।


भारत और इथियोपिया: नई उभरती शक्तियाँ

भारत 6.6% की अनुमानित दर से दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। “मेक इन इंडिया”, डिजिटल इंडिया और बुनियादी ढाँचे में भारी निवेश जैसे कार्यक्रमों से इसकी आर्थिक गति बनी रहेगी।

इथियोपिया 7.2% की दर से सभी विकासशील देशों में शीर्ष पर है। कृषि, निर्माण और सेवा क्षेत्र में तेज़ी से विस्तार ने इसे अफ्रीका का नया आर्थिक केंद्र बना दिया है।


2025: आर्थिक शक्ति का पूर्व और दक्षिण की ओर झुकाव

यदि IMF के अनुमान सही साबित होते हैं, तो 2025 वह वर्ष होगा जब वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया और अफ्रीका की ओर निर्णायक रूप से स्थानांतरित हो जाएगा।

ब्रिक्स+ देश, जो विश्व की लगभग आधी जनसंख्या और एक-तिहाई जीडीपी का प्रतिनिधित्व करते हैं, अब वैश्विक वृद्धि का 60% से अधिक योगदान देने की राह पर हैं।

वहीं, G7 देश अब अपने फोकस को तेज़ वृद्धि से हटाकर मुद्रास्फीति नियंत्रण, स्थिर रोजगार और तकनीकी प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित कर रहे हैं।

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